मेरे शब्द

and She continued….

जिन दिनों मैं प्रेम में थी

मैंने लिखी छक कर प्रेम कविताएँ

पीड़ा के दिनों में

गोधूलि की बेला को सजाया मैंने

व्यथाओं की रंगोली जैसी कविताओं से

जब छूट रहा था मेरे हाथ से जीवन कण कण होकर

तब भी मैंने दिए शब्दों को पर

उड़ने दिया उन्हें कविताओं के आसमान में

मौन के गर्भगृह में भी खड़ी रहीं मेरी कविताएँ

दाई के हाथों की थरथराहट बन कर

मैंने अपनी जी हुई हर परिस्थिति को

शब्दों की टोकरी में भरा है

मैंने क्षण क्षण बदलते अपने ही व्यक्तित्व को

अपने ही शब्दों में तोड़ तोड़ कर पढा है

मैं धारणाओं के पुल बनाती बिगड़ती रहती हूँ

टूटती हुई धारणाओं के वंशज हैं मेरे शब्द।

अलविदा

It’s not the goodbye that hurts, but the flashbacks that follow- internet

रात के करीबन डेढ़ बज रहे थे। आज के दिन का ये समय खास था क्योंकि 25 साल पहले आज के ही दिन, इस तरह की रात रही होगी और ठीक इसी समय उसकी मोहब्बत ने पहली बार सांस ली होगी। वो दोनों साल भर पहले ही मिले थे तो ज़ाहिर सी बात है आज पहली बार बर्थडे विश दी जानी थी संध्या की ओर से प्रभात को। पर संध्या ने सबकी तरह 12 बजे कौन पहले की रेस को छोड़ कर प्रभात के जन्मसमय के अनुसार विश करना चुना।

प्रभात के जन्मसमय पर संध्या ने कॉल किया, प्रभात भी संध्या के ही फोन के इंतज़ार में बैठा था शायद। पहली ही घण्टी में उसने फोन उठा लिया।

– हेल्लो
– हैप्पी बर्थडे टू यू
– थैंक यू
– तो आज पार्टी कहाँ हो रही है साहब की
– कुछ दोस्तों के साथ ऐसे ही तफरी करने निकला था
– अच्छा
– मैं तुम्हारे फ़ोन का इंतज़ार कर रहा था
– मुझे लगा मुझे भूल ही गए होंगे
– तुम्हें कभी नहीं भूल सकता
– इतने उदास क्यों लग रहे हो, दोस्तों ने पार्टी नहीं दी क्या अच्छे से
– पार्टी तो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी
– अरे… क्यों
– उन दोनों को जाना पड़ा
– सब ठीक तो है न?
– तुम से बात कर ली अब सब ठीक है
– हा हा हा… अच्छा ऐसा क्या
– हां
– तो अब
– अब मैं भी जाऊँगा, बस तुमसे बात करने के लिए रुका हुआ था
– चलो ठीक है फिर, पहुंच कर फोन …..

संध्या की बात पूरी भी न हो सकी थी की फ़ोन कट गया। प्रभात को आदत नहीं थी इमोशन्स शेयर करने की, उसे हमेशा इस तरह की उदासी के समय थोड़ा सा समय चाहिए होता था। इसलिए संध्या ने दोबारा फ़ोन नहीं किया। सुबह प्रभात का ही फ़ोन आया। आधी नींद में फ़ोन उठा लर संध्या बोली

– बर्थडे बॉय का मूड कैसा है अब
– कौन बोल रहे हैं आप मैडम?
– सॉरी?
– इस नंबर पर आपकी मिस काल थी, कोई अपना फोन हमारे रेस्टोरेंट में भूल गया, लास्ट नंबर आपका था तो आपको ही कॉल कर दिया। आप अगर ओनर को इन्फॉर्म कर सकें तो अच्छा होगा।
– ओह… थैंक यू। मैं बताती हूँ
– मैम आप रेस्टॉरेंट के नंबर पर कॉल कर लीजिएगा। इस फोन की बैटरी डेड होने वाली है
– ठीक है

रेस्टोरेंट का नंबर नॉट करके संध्या ने प्रभात के घर फोन मिलाया। फोन प्रभात की छोटी बहन ने उठाया

– हेल्लो
– रानो, मैं संध्या बोल रही हूँ, प्रभात से बात हो सकती है क्या
– संध्या मैम, भइया तो हॉस्पिटल में हैं। मम्मी-पापा वहीं गए हैं
– हॉस्पिटल? क्या हो गया।
– कल उनका एक्सीडेंट हो गया था रात में। राहुल भइया के पापा आये थे, सब लोग हॉस्पिटल गए हैं।

संध्या जल्दी से हॉस्पिटल का एड्रेस लेकर चल पड़ी। रास्ते में उसने वही रेस्टॉरेंट देखा जिसमें प्रभात का फोन छूट गया था तो वह फ़ोन लेती हुई चली गयी। राहुल की सभी डिटेल्स उसके फ़ोन में थी, क्या जाने कब किस चीज़ की जरूरत पड़ जाए।

ऑटो में बैठ कर संध्या ने फ़ोन को पावर बैंक से जोड़ा और फ़ोन ऑन किया। प्रभात की और उसकी मुस्कुराती हुई तस्वीर वॉलपेपर पर थी। उसने ऐसे ही कॉल हिस्ट्री खोल ली यह सोचते हुए कि अभी कुछ घण्टों पहले ही तो वो दोनों बात कर रहे थे, कैसे हो गया सब।

उसकी डेढ़ बजे की मिस कॉल फोन में दिख रही थी। पर उसका कॉल तो प्रभात ने उठा लिया था। हॉस्पिटल आ गया था ऑटो रुका। संध्या अपने आप में खोई हुई बोली

– राहुल, विनय और प्रभात तीनों तो जा चुके हैं… मैं यहाँ किस से मिलूंगी… भइया आगे चलिये यहाँ नहीं रुकना है।

तड़ित

Lightning makes no sound until it strikes- internet

गिरने में और बहने में अंतर होता है। कई बार हम बह रहे होते हैं पर हमें लग रहा होता है कि हम गिर रहे हैं। जब गिरते हैं तो समझ आता है हमने अपना बहना खो दिया।

गिरते रहने के स्वप्न बहुत आम बात हैं, सबको ही आते हैं और अक्सर ऐसे सपनों को देखने के उपरांत हमारी नींद झटके से खुल जाती है। पर शाश्वत के साथ ऐसा नहीं था, वह गिरता तो था पर उसके गिरने में निरंतरता थी, उसे गिरने के साथ गिरना पसन्द था, पूरी रात वह सपने में गिरता ही रहता, निर्वात में बहता रहता, कहीं भी दूर दूर तक धरती न थी और ना ही धरती से टकराने का डर, उसकी नींद बीच में कभी नहीं खुलती, बल्कि इस तरह के सपने देखने के बाद तो खुलती ही नहीं। जब तक कोई उसे झंकझोड़ कर उठा न दे,  वह स्वप्न में ही कहीं बहता रहता।

सपनों से बाहर की ज़िंदगी में वह आम सा दिखने वाला लड़का बहुत ऊँचा उठ जाना चाहता था, उसे लगता था जितना ऊपर उठेगा, गिरने में उतना मज़ा आएगा। वह ऊँची ऊँची इमारतों को देखता और अंदाज़ा लगता अगर यहाँ से कूदा जाए तो कितनी देर में ज़मीन से टकराया जा सकता है। समय की गणना करने के पश्चात वह निराशा से देखता उसी इमारत को और फिर वह इमारत चींटी जितनी छोटी लगने लगती।

एक फ़न्तासी वर्ल्ड होता है जिसमें बचपन में हम सब जीते हैं। जैसे कुछ लड़कियाँ सफ़ेद घोड़े पर सवार राजकुमार के सपने देखती हैं, कुछ लड़के चाँद की बूढ़ी अम्मा को उतार लाने के सपने देखते हैं, कुछ बच्चे खिलौनों की फैक्ट्री बनाने के बारे में सोचते हैं ऐसे ही शाश्वत भी अपने सपनों की दुनिया में निर्वात का ओर-छोर समझना चाहता था, वह बस निरंतर गिरना चाहता था।

कुछ बड़े होने के साथ साथ शाश्वत की यह धारणा भी ख़त्म हो गयी कि दुनिया में कोई ऐसी जगह हो सकती है जहाँ से बस गिरा जा सके और बस गिरते ही रहा जा सके। वह अब इमारतों से आगे सोचता, सोचता ऐसे किसी ग्रह के विषय में जहाँ पहुँच कर छलांग लगाई जा सके। वह ग्रहों की दूरियों और ब्रह्मांड में फैले निर्वात के विषय में सोचता। पर बिना गुरुत्वाकर्षण के गिरा कैसे जा सकता है? बिना सांस लिए जीवित कैसे रहा जा सकता है और बिना जीवित रहे कैसे उस गिरते रहने को जिया जा सकता है?

नन्हे मन में प्रश्न बहुत थे और उत्तर कोई नहीं, क्लास में कभी कभी वह कुछ पूछ लेता तो सब बच्चे उसका मज़ाक ही बनाते और टीचर उसे उम्र के साथ चलने की हिदायत दे देते। ऐसे में वह अपने भीतर और बाहर की दुनिया में सामंजस्य नहीं बैठा पाता। उसे किसी हाल में अपने बहते निर्वात को छोड़ना मंजूर नहीं था, तो हुआ कुछ यूँ कि धीरे धीरे उसके दोस्त, उसका सामाजिक जीवन उससे छूटता गया।

उन्हीं दिनों की बात है जब स्कूल में एक नए टीचर चर्चा का विषय बने थे। वह अपने व्यक्तित्व की वजह से लड़कियों और महिला अध्यापिकाओं में खासे चर्चित थे। व्यवहार के भले भी थे और बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने के शौकीन भी। उस दिन शाश्वत की कक्षा में उनका पहली बार आना हुआ। सब से परिचय के बाद उन्होंने सबसे पूछना शुरू किया कि क्या बनना चाहते हैं? बच्चों ने अपने अपने हिसाब से जवाब दिए पर शाश्वत को समझ नहीं आ रहा था वह क्या कहे। इतने में उसकी बारी भी आ गयी। वह खड़ा हुआ और डरते डरते बोला

– सोचा नहीं है सर

– अरे… ग्याहरवीं में आ गए हो और अब तक ये नहीं पता कि क्या करना चाहते हो?

– नहीं

– साइंस क्यों चुना तुमने,यह पता है?

– मुझे ग्रहों के बारे में पढ़ना पसन्द है

– ये तो अच्छी बात है, और क्या पसन्द है

इतने में कोई बच्चा बोल पड़ा

इसे सपने देखना पसंद है

और सारी क्लास ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी।

मौर्या सर ने मुस्कुराते हुए कहा

– सपने देखना अच्छी बात है, जो सपने देख नहीं सकता वह सपने कभी पूरे नहीं कर सकता।

यह बात शाश्वत के मन में बैठ गयी और साथ ही साथ बैठ गए मौर्या भी उसके मन में।

मौर्या सर का व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली था, कोई भी बच्चा कहीं से भी उठा कर कुछ भी पूछ लें वे कभी झुंझलाते नहीं थे, वे बच्चों को पढ़ाई के साथ साथ, खेल और कोई न कोई हॉबी जरूर बनाने को कहते। उनके कहने से पहली बार शाश्वत ने समझा कि वह किताबों के सिवा किसी चीज़ पर ध्यान नहीं देता। उसे बस प्रश्नों के उत्तर चाहिए होते हैं और कुछ नहीं। उसकी कोई हॉबी नहीं।

एक दिन जब उसने मौर्या सर को लाइब्रेरी में अकेले कोई किताब पढ़ते देखा तो उनके पास जा कर बोला

– गुड आफ्टरनून सर

– गुड आफ्टरनून शाश्वत (मौर्या सर ने मुस्कुराते हुए बोला)

शाश्वत के लिए यही बड़ी बात थी कि उसके प्रिय अध्यापक उसका नाम जानते थे।

सर ने उसे बैठने का इशारा किया, और बोले

– कुछ पूछना चाहते हो?

– न… नहीं

– मैं कुछ दिनों से देख रहा हूँ तुम कुछ कहना चाहते हो पर कह नहीं पाते। यहाँ भीड़ नहीं है, कोई मज़ाक नहीं बनाएगा, कहो

– म..म… मुझे कुछ करना पसंद नहीं है, बस गिरना पसन्द है

– गिरना?

– वो सपने में गिरना और बिना रुके गिरते ही जाना। क्या मैं पागल हूँ

हिम्मत करके शाश्वत ने एक ही साँस में कह दिया। मौर्या सर हंसे और उसके सर पर हाथ रख कर बोले

– नहीं, किसने कहा तुम पागल हो

– सब कहते हैं, पर मुझे और कुछ भी करना पसंद नहीं है

– इसलिए तुमने साइंस का विषय चुना

– आपको कैसे पता?

– क्योंकि धरती पर तो ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ से गिरा जाए और गिरते ही रहा जाए

– तो क्या ब्रह्मांड में ऐसी जगह है? बिना गुरुत्वाकर्षण के ये मुमकिन है? पृथ्वी के या किसी ग्रह के मंडल में आये बिना कैसे गिर सकते हैं? वह तो बहना हुआ न? क्या ह। बिना सांस के जीवित रह सकते हैं…

– अरे अरे बस बस, मैं साइंस का नहीं इंग्लिश का टीचर हूँ (शाश्वत को टोकते हुए सर बोले)

– सॉरी सर

– सॉरी की कोई बात नहीं बच्चे, तुम जो खोज रहे हो वह ज्ञान का विषय है विज्ञान का नहीं

– मतलब?

– मतलब यह कि तुम्हारी हॉबी क्या है पता है तुम्हें?

– नहीं

– उसे ढूंढो पहले, ऐसी चीज़ खोजो जिसे करते हुए तुम्हें उसी निर्वात में बहने का अनुभव हो जो कि तुम्हें स्वप्न में दिखता है।

– ऐसी कौनसी चीज़ हो सकती है?

– क्या तुमने कभी पढा है हमारे भीतर भी एक ब्रह्मांड है, उसी ब्रह्मांड की तरह जिस में हम रहते हैं

– नहीं

– इस विषय में खोज़ करनी है?

– हाँ

– ठीक है फिर

यह कह कर मौर्या सर चले गए, उसके हाथ में एक पर्चा पकड़ा कर।

अगले दिन स्कूल में मौर्या सर के देहांत का समाचार आया। सुनने में आया कि वे अकेले रहते थे और शाम के समय उनके घर में गैस लीक होने की वजह से आग लग गयी थी। वे अपने बिस्तर पर ही पाए गए। दो मिनट का मौन रखा गया और उसके बाद स्कूल की छुट्टी हो गयी। शाश्वत कुछ ज़्यादा ही धीमा चल रहा था, मौर्या सर की चर्चा हर कोई कर रहा था और वह उस नाम से ही कांप जा रहा था, जैसे बिजली सी गिर गयी हो उसपर। घर में भी उसने कुछ नहीं कहा और सो गया।

सपने में वह गिर रहा था पर गिरते हुए वह टकरा रहा था, कभी पहाड़ों से, कभी पत्थरों से, उसके शरीर पर तरह तरह के निशान उभर आये थे, वह समझ रहा था यह सपना है पर वह किसी भी तरह जाग नहीं पा रहा था। और फिर उस दिन वह धम्म से एक खून की खौलती नदी में गिर पड़ा। उसकी नींद खुली उसने ख़ुद को पसीने से तरबतर पाया। नहाने के लिए वह बाथरूम में गया और उसने अपने शरीर पर वही निशान देखे। देर तक शाश्वत अपने निर्वात के भंग होने पर रोता रहा। अब वह आम बच्चा हो गया, जिसे गिरने से ड़र लगता था।

पितृ पक्ष

Those we love never truly leave us. There are things that death can not touch- Jack Thorne

– क्यों आयी हो आप यहाँ, आपको तो मेरा पढ़ना, आगे बढ़ना पसन्द नहीं न
– मुझे लगा तुम परेशान हो
– मैं परेशान नहीं, और अगर हूँ भी तो आप मेरी परेशानी दूर नहीं कर पाएंगी बल्कि बढ़ाएंगी ही
– इतना गुस्सा नहीं करते, मेरी तरह बूढ़ी हो जाओगी जल्दी ही

कहते ही दादी नन्हे बच्चे की तरह खिलखिला कर हंस पड़ी और माधवी को लगभग धक्का देती हुई फ्लैट में घुस गई। माधवी न उन्हें बाहर ही धकेल पाई, ना ही उनका स्वागत कर पाई। वो तो जैसे बरसों पुरानी दुश्मनी निभाने के पूरे मूड में थी।

उसे याद था जब दसवीं में वह उत्तीर्ण हुई थी तो इन्हीं दादी ने माँ को सुनाते हुए कहा था “फर्स्ट आ कर कौनसा कलेक्टर ही बन जाएगी तुम्हारी बेटी”। उस दिन माधवी ने मन में गांठ बांध ली थी कि आर्थिक और भवनात्मक रूप से उसे आत्मनिर्भर बनना ही है। उसने माँ को सदैव चुपचाप दादी की शिकायतें और ताने सुनते देखा था बावजूद इसके माँ ने कभी पलट कर जवाब नहीं दिया। दादी बीमार हुई तो माँ रात रात भर उनके सिरहाने पर बैठी रही। एक बारी को उसको और उसके पापा, भाई को माँ ने भले ही नज़रंदाज़ कर दिया हो पर दादी को कभी नज़रंदाज़ नहीं किया।

दादी को कोई भी काम हो तो उन्हें माँ या माधवी याद आते थे और कुछ देना हो, कुछ बांटना हो तो भाई(अपना और चाचा का लड़का)। दादी कभी उसके चाचा के घर नहीं टिकी क्योंकि चाची के साथ बनती ही नहीं थी उनकी। वो माँ की तरह सुनती नहीं थी, पलट कर जवाब देती थीं। कभी उसने माँ से पूछा भी हो तो उनका जवाब होता था “जो घर के बड़ों की इज़्ज़त नहीं करता वह जीवनमें कुकब नहीं कर सकता”। उसे आज तक भी समझ नहीं आया था आख़िर माँ ने क्या हासिल किया ख़ुद को हमेशा दूसरों के लिए ख़र्च करके।

दादी अंदर आ चुकी थी और उसका किचन टटोल रही थी। वो खिसियाते हुए दादी के बगल में पहुंची तो दादी बोली

– तुम्हारी माँ ने कभी हमें बात नहीं करने दी, इसलिए आज सोचा तुमसे बात ही कर लूँ। कल वो फिर पूजा पाठ में लग कर मुझे उलझा लेगी
– माँ ने बात नहीं करने दी या आप ने कभी मुझे बात करने लायक ही नहीं समझा
– तुमसे ज्यादा अपना कोई था ही नहीं मेरी बच्ची। तुम्हारी माँ तुम्हें अपनी तरह बना देती, अगर मैं नहीं होती।
– मैं अपनी माँ जैसी ही बनना चाहती हूँ, आप जैसी नहीं।

दादी मुस्कुराई और बोली

– अच्छा आजकल तुम इतनी परेशान क्यों हो

माधवी को लगा जैसे उन्होंने उसी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। एकबार को उसका मन उनसे लिपट कर रोने का हुआ। पर उसने उनकी ही बातों और तानों से मजबूत होना सीखा था, उन्हीं के सामने कैसे टूट कर बिखर जाती। बात पलटने के लिए उसने उन्हें पानी का ग्लास देते हुए कहा

– अकेली कैसे आयी हो? पापा ने आने दिया
– वो मुझे रोक सकता है?
– अरे पर आप तो कभी बाहर आई ही नहीं।चाचा का घर एक कॉलोनी दूर था तब भी आपको माँ या पापा छोड़ने जाते थे अब इतनी दूर दूसरे शहर में कैसे आयी
– तुम ने तो बुलाया
– मैंने कब बुलाया?

माधवी के लिए शायद दुनिया में आखरी इंसान भी दादी होती तो वो उन्हें याद नहीं करती।

– कल तुम कह रही थी न “ऐसी ज़िन्दगी है। इससे तो दादी की बात ही सही थी, घर बार सम्भालना या तो मर ही जाओ” ऐसा ही कुछ
– आपको कैसे पता
– पोती हो तुम मेरी
– कॉस्ट कटिंग के चक्कर में जॉब जाने वाली है मेरी और मैं नहीं जानती मुझे आगे क्या करना है

कहने के बाद माधवी पछताई किसको कह दिया। ये घर जा कर अब फिर क्लेश करेंगी। पर उसकी उम्मीद के विपरीत दादी सोफे पर आराम से जा कर बैठ गयी और उसका भी हाथ खींच कर बैठा दिया। उसे बालों को हल्की हल्की उंगलियों से सहलाती हुई दादी बोलीं

– मरने की बाद क्यों करती हो लाडो, तुम्हारी माँ की तपश्या हो तुम, मेरा प्रयाश्चित। मैं चाह कर भी तुम्हारी माँ की पढ़ाई, उसके सपनों को बचा नहीं सकी। मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि अपने परिवार, अपने गांव के विपरीत जा कर उसके सपनों को पनपने देती। तुम्हारे दादा जी और पिता बहुत सीधे हैं, तुम्हारी माँ भी। दादा जी के संघर्षों से मैंने बस यही सीखा कि अपने परिवार को बचाना है। खानदानों और रिश्तेदारों में होने वाली खींचातानी से वो दोनों बच नहीं सकते थे। पिता तो फिर भी बाहर नौकरी करके इन सब से दूर रह सकते थे पर माँ नहीं। मैं सख़्त नहीं होती तो क्या होती। मेरी सख़्ती की वजह से हर फैसले का भार मुझ पर था । परिवार में एक सदस्य तो तेज़ होना ही चाहिए,वरना खानदान वाले ही सीधे जोड़ों को नोच खाते हैं।

आज पहली बार माधवी ने दादी की आँखों में देखा। फिर भी शंका तो शंका ही होती है न। उसने सवाल किया

– पर मेरा जन्म तो तब हुआ जब माँ-पापा शहर आ गए थे।मुझे क्यों इतनी सख़्ती की।


– इसलिए कि तुम जिस जमाने में हो वहाँ तुम्हें दो दुनिया में लड़ना पड़ता। घर परिवार और काम काज। अगर बचपन से तुम्हें लड़ना और अपने हक़ के लिए कहना, मेहनत करना न सिखाया जाता तो तुम आज यहाँ नहीं होती। हर किसी को मेरे रघु जैसा पति मिले जरूरी तो नहीं। जानती हो बेटियों को बेटों से ज़्यादा मजबूत बनना होता है। फिर चाहे उसके बाद वो बस घर परिवार को चलाना चुने या फिर संसार जीतने का सपना चुने। अकेले रहना चुने या फिर साथी का साथ निभाना चुने। उन्हें चुनाव का अधिकार समाज वसीहत में नहीं देता।

दादी की बात सुन कर माधवी उनकी गोद में सर रख कर लेट गयी। दादी गलत नहीं कह रही थी। उसने संघर्ष देखे थे। भले ही उसके पापा-भाई और दोस्त उसके साथ हमेशा खड़े रहे पर उसके लिए से गर्ष थोड़ा ज़्यादा था, जबकि उसके दोस्तों(जो लड़के थे) के लिए कम। उसको शिफ्ट्स के बारे में सोचना पड़ता था। अब तक की दो जॉब्स में उसने देखा था कि कोई न कोई व्यक्ति ऐसा था ही आफिस में जो लड़की का मतलब एक फ़्लर्ट मटेरियल ही समझता था। उसने वो कमेंट भी सुने थे जहाँ उसके बॉस को लड़कीबाज़ बस इसलिए कह दिया गया क्योंकि उसकी सीनियर लड़की को उसके सीनियर लड़के से पहले प्रमोशन मिला। सब नहीं थे पर ऐसे लोग थे। और ऐसे लोगों से आप लड़ें या ना लादेन पर कहीं न कहीं वो आपके मन की शांति को भंग जरूर कर देते हैं। ऊपर से कॉपोरेट वर्ल्ड की पॉलिटिक्स। उससे आज तक कौन बच सके है।

यही सब सोच कर माधवी की आँखों से आँसू छलक पड़े। दादी में प्यार से उसके गाल पर चपत लगाई और बोलीं

– जानती हो तुम्हारी माँ से मैंने क्या सीखा


– क्या(लेटे लेटे ही उनकी ओर देखते हुए माधवी ने पूछा)


– आपदा को अवसर में बदलना। वह एक अच्छी क्या कहते हो तुम लोग बिज़नेस वुमन बन सकती थी पर गलत समय पर पैदा हुई। वैसे तुम क्यों नहीं अपना कोई काम शुरू करती


– कौनसा काम शुरू करूँ?


– कितना कुछ है दुनिया में जो बना नहीं है अभी, और जो बना भी है वो कितना सही है। सोचो और देखो


– कुछ सोचने जैसे हालात भी नहीं हैं


– तुम आजकल के बच्चे ज़रा ज़रा सी बात में घबरा जाते हो।


– आप नहीं घबराती?


– हमारे पास अवसर कम थे। पर फिर भी जितने अवसर थे हमने उन्हें समेटने की पूरी कोशिश की


– अच्छा… जैसे?


– जैसे तुम्हारे दादा जी संत व्यक्ति थे। उनका मन बस पूजा पाठ में जी लगता था। वे अपनी पूजा के लिए कोई सामान बाहर से नहीं लाते थे। हवन सामग्री, धूप,अगरबत्ती सब ख़ुद या फिर तुम्हारी माँ और मैं बनाते थे। तुम्हारे पिता खुले विचारों के जरूर थे पर वे अपनी नौकरी में ही संतुष्ट थे। तुम्हारी माँ ने उस समय किसी तरह तुम्हारे दादा जी को मना कर एक छोटा सा अगरबत्ती, धूप, हवन सामग्री बनाने का कार्य शुरू किया था। यह बात कोई नहीं जानता, सबको लगता है परोहित जी ने ये कार्य शुरू किया था। हमारे गांव के कई लोगों को उससे रोज़गार मिला था पर उनकी मृत्यु के बाद तुम्हारी माँ का हौसला टूट गया। घर के बाहर जा कर अपने बड़े बूढ़ों से लेन देन की बात करना उस ज़माने में कहाँ शोभा देता। पिता को तुम्हारे व्यापार समझ नहीं आता था और चाचा बहुत छोटे थे। तुम्हारा भी तो जन्म होने वाला था तब। तुमने दादाजी को नहीं देखा न अपने


– नहीं। आप लोगों ने तो कभी उनकी तस्वीर भी नहीं दिखाई


– कोई तस्वीर थी ही नहीं। तुम्हारे जन्म के बाद फिर हम शहर आ गए और लौट कर गए ही नहीं। गांव से कोई आता है तो अब भी कहता है परोहित जी के द्वारा बनाई गई हवन सामग्री से ही पूजा सही मायने में सम्पन्न होती थी।


– अच्छा दादी एक बात तो बताओ


– क्या


– मुझे भी हवन सामग्री बनाने वाली बनाना चाहती हो क्या

माधवी की बात सुन कर दादी बच्चों की तरह खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली।

– अब तो मशीनें सब काम करती हैं बेटा। बाकी तुम जानो पर इतना समझो कुछ उद्योग ऐसे होते हैं जिनकी पहुँच घर घर में होती है। हर जाति, हर धर्म, अमीर, गरीब हर किसी को उन चीजों की जरूरत होती है। बाकी सरकारें लघु और कुटीर उद्योगों पर ध्यान दे रही हैं इस समय तो नौकरी जाने की आपदा को उद्योग खड़ा करने का अवसर भी तो समझा जा सकता है।

माधवी पल भर के लिए सोच में पड़ गयी। कहीं न कहीं दादी की बात सही थी।

दादी ने फिर से कहा।

– देखो पर मेरा मेहनताना मत भूलना। जब घर आओ तो मेरे लिए कॉटन की पीले बॉर्डर वाली साड़ी और वो चॉकलेट वाली मिठाई जो तुम मुझे चिढ़ा चिढ़ा कर खाती थी जरूर लेकर आना और किसी को मत बताना कि मैंने तुमसे अपने परिवार के राज साझा किए हैं।

दादी ने माधवी के माथे को चूमा उसे कस कर गले लगाया और बोली। जाओ तुम्हारी माँ का फ़ोन आ रहा है।

फ़ोन बेडरूम में पड़ा था। माधवी भाग कर गयी, माँ का ही फ़ोन था।

– हेल्लो माँ


– कहाँ हो तुम?


– यहीं तो हूँ, क्या हुआ?


– घर के लिए कब निकलोगी आज या कल सुबह?


– घर के लिए? अरे माँ…

माँ बीच में ही बात काटती हुई बोली।

– भूल गयी या गुस्से में नहीं आ रही है? देख बेटा दादी का पहला श्राद्ध है। तू नहीं आएगी तो उन्हें दुख होगा। अपने पितरों को नाराज़ नहीं करते। और सुन मैं आज बाज़ार गयी थी धोती(कॉटन की साड़ी) लेने पर मुझे कोई पसन्द ही नहीं आयी। दादी को तेरी कोई बजी रंग पसन्द नहीं आता था, मैं चाहती हूँ कुछ युनकी पसन्द की साड़ी ही दान करूँ। कल पूजा से पहले पहुँच जाएगी न तू

– हाँ माँ, पीले बॉर्डर की कॉटन वाली साड़ी ले आऊँगी और चॉकलेट वाली मिठाई भी। आप मिठाई मत खरीदना आउट मैं अभी मार्किट निकल रही हूँ, रात की बस ले लूँगी। ख़ोयी ख़ोयी सी माधवी ने बिना माँ की आगे की बात सुन ही फ़ोन काट दिया।

ॐ हो

We are Alpha and Omega of GOD

कोशिश करके
पाया जा सकता है नया कुछ
जो विद्यमान है पहले से ही
उसको खोजा जाए कैसे
साक्ष्य देकर
प्रस्तुत किया जा सकता है तथ्य
जो सत्य है चराचर जगत का
उसे समझा जाये कैसे

कैसे स्वप्न नगरी के किवाड़ बन्द कर
अल्पमृत्यु का स्वाद चखें
कैसे मृत्यु की गंगा में बहकर
समाधिस्थ ज्ञान चुन लें

आहार है मन का
आशा-निराशा, तर्क-वितर्क-कुतर्क

कोई राह, कोई भाव, कोई जगह तो ऐसी हो
मन जहां जड़ हो जाये
देखे होकर मौन, बना रहे निर्वितर्क
स्वयं ही अग्नि, स्वयं ही मंत्र
स्वयं ही इष्ट, स्वयं ही होम हो

ॐ हो।

खोज़

Dreams are gateway to souls destiny

तुम्हारे लिए लिखी थी मैंने
पहली कविता तब
जब मैं नहीं जानती थी
‘प्रेम’ भी होता है कोई शब्द


मैं देखती थी तुम्हें
सपनों में एक पर्वत पर
मेरे संग खेलते हुए
श्वेत पंछियों के जोड़े को पुचकारते हुए
दौड़ते हुए भागते हुए
पर तुम किसी भी अवस्था में
नहीं छोड़ते थे हाथ मेरा

तुम मेरा सुरक्षा घेरा थे
जिसके भीतर छुप कर
मैं कट जाती थी दुनिया से

कितना समय बीत गया उस बात को
मैं अब कितने ही शब्दों के अर्थ समझती हूँ
पर वह जो अबोला शब्द था प्रेम का पर्याय
वह शब्द मुझे कहीं नहीं मिला
न मिली तुम्हारी गहरी आँखें

न दिखा वैसा पर्वत, न श्वेत पंछियों के जोड़े को
देखा मैंने कहीं
न ही कोई ऐसा रहा जिसने कभी न छोड़ा हो हाथ मेरा
कितना कुछ बदल गया मेरे जीवन में

पर आज भी
जब थक जाती हूँ, हार जाती हूँ
भाग जाना चाहती हूँ दुनिया से
मैं खोजती हूँ निमलित नेत्रों से
तुमको अपने सपनों में

मैं उस निर्विकल्प प्रेम को
खोजती हूँ आज भी।

कुछ कहूँ

People who do not understand your silence will never understand your words- Internet

कई दिनों से सोच रही थी
तुम से कहूँ, ख़िज़ाँ-ए-फ़िरदौस से लाई हूँ
तुम्हारे लिए चुन कर चन्द अल्फ़ाज़ तिलस्मी
हूबहू तुम्हारे झूठ के रंग में डूबे हुए
तुम शायर हो, तुम्हें तो मालूम ही होगा
बा-मानी-ओ-बे-मानी की बातों को
किस तरह से कहना है

किस तरह से रम्ज़-ए-मोहब्बत का नाम लेकर
खेलना है मासूम दिलों की ज़िंदगानी से

सोच रही थी तुम से कहूँ
सुख़न-दानों के बीच बैठो, कुछ सुनाओ तुम भी
कितने दिन हुए देखी नहीं तुम्हारे लफ़्ज़ों की जादूगरी
कितने दिन हुए कोई आया नहीं गिरफ़्त में तुम्हारी नज़्मों के

मैं तारीकियों में बैठ कर सोचती हूँ
क्या आख़री मोहब्बत थी मैं तुम्हारी
कहो महफ़िल में कुछ तो फिर से
फिर से कोई और निशाना ढूंढों
शीशे के मांनिद फिर टूटे कोई दिल तो, हो यकीं मुझको
मैं भी एक दौर ही थी बस… मोहब्बत नहीं।

पीड़ा

Pain is as sacred as prayers

तुमने देखा है कभी
आँखों से गिरते हुए आँसुओं को गौर से
उनमें धड़कती है एक उम्मीद
किसी उंगली के पोर को छू भर लेने की

रुंधे गले में चुप्प होकर बैठी हुई आवाज़ के
मौन को सुना है कभी
वो पुकारती है बिना शब्दों के भी
कोई नाम हो ऐसा जिसके होने भर से
कह दे वो सब कुछ अनकहा

वो खोखली हंसी
जो होठों से आँखों तक के सफ़र में ही
दम तोड़ देती है
कितना आहिस्ता चलती है देखना कभी
वो करती है प्रतीक्षा
कोई हाथ थाम कर उड़ा ले जाये उसे
ख़्वाबों के सतरंगी जंगलों में

और वो बिखरे हुए शब्द
जो भुला दिए जाते हैं बातों के बीच में ही कहीं
कहकर “क्या था वो… चलो जाने दो”
उन शब्दों में कभी महसूस की है
टूटी हुई डोरियों की चर्मराहटों सी ध्वनि
वो खोजती हैं शिवालय सा कोई कौना किसी मन का
जहाँ जा कर प्रार्थनाओं सा कह सकें
सबकुछ बिना रोक टोक के ही

भिक्षुक से बने स्वप्न कभी कभी
हाथ की मिटती हुई लकीरों से मांगते हैं
क्षण भर का जीवन

हम देखते हैं पर देखते नहीं
पोंछते तो हैं आँसू, पर उन्हें मार देते हैं
वे स्पर्श की लालसा में
लेकर पुनर्जन्म फिर ढुलक जाते हैं आँखों से
शब्द हकलाते हैं, छूट जाते हैं
चाहते हैं कोई पिरो ले उन्हें मोती सा
पहन में कंठ में माला बना कर

सिसकियाँ चाहती हैं
किसी मन के शिवालय में
गूंजे वो भी डमरू की डम डम की तरह

कौन कहता है पीड़ा कर देती है व्यक्ति को निष्प्राण
मैं कहती हूँ, पीड़ा में भी प्राण होता है।

निर्वासन

The shell must break before the bird can fly- internet

तान्या एक खूबसूरत, विदुषी व व्यवहारकुशल लड़की थी। चार साल पहले तक वह उन लड़कियों की श्रेणी में खड़ी थी जो अपने भाग्य का फैसला स्वयं लेती हैं। जिन्हें समाज़ और रूढ़ियाँ अपने इशारे पर नहीं चला सकती थीं। अपनी पढ़ाई का खर्चा ख़ुद से चलाना, अपने लिए स्वयं जीवन साथी खोजना। अपनी पसंद की नौकरी को हासिल करना सब कितना आसान था। आसान था माता-पिता से लड़ कर अपने सपनों की उड़ान भरना पर जब पंख ही काट दिए जाते हैं तो पंछी उड़ते नहीं मात्र आकाश को देख कर मौन विलाप करते हैं। आज तान्या भी उसी मौन विलाप की सूली पर चढ़ी हुई थी।

चार साल पहले जब उसने जावेद से शादी करने का फ़ैसला लिया था तब वह नहीं जानती थी प्रेम से बढ़ कर भी कुछ हो सकता है। उसके लिए प्रेम ही ईश्वर, प्रेम ही जीवन और प्रेम ही जावेद का पर्याय था। यह सब कुछ किसी परिकथा की तरह था।

जावेद और तान्या एक ही कॉलेज से पीएचडी कर रहे थे। जहाँ जावेद पढ़ाई के साथ साथ सोशल और पोलिटिकल एक्टिविस्ट के रूप में भी सक्रिय था वहीं तान्या के लिए एक स्त्री के रूप में बिना किसी मदद के ख़ुद को स्थापित करना सबसे बड़ी चुनौती थी। जावेद के विचार आधुनिक स्त्री के लिए काफी ऊँचे थे और यह एक बड़ी वजह थी जो तान्या का झुकाव जावेद की ओर हुआ। शुरुआती दौर में तान्या के कुछ मित्रों ने उनकी नजदीकियों पर आपत्ति जताई पर धीरे धीरे निधि जो कि तान्या की बेस्ट फ्रेंड थी उसके सिवा किसी ने भी कुछ भी कहना बन्द कर दिया। जावेद का व्यक्तित्व ही इतना आकर्षक था कि जो भी एक बार उससे मिलता उसके गुणगान करने लगता था।

शादी के लिए न तान्या और ना ही जावेद के परिवार वाले तैयार थे। पर प्रेम जाति, धर्म, समाज की कहाँ मानता है और तान्या को तो ऐसे भी अपने सपनों के लिए संघर्ष करने की आदत थी। सो उसे इस बात से ज़रा भी अचरज नहीं हुआ। हाँ जावेद जरूर कुछ समय परेशान रहा परिवार की दखलंदाजी की वजह से पर तान्या से दूर रहना उसके लिए मुमकिन न हो सका।

तान्या  चाहती थी कि उनका विवाह विशेष विवाह अधिनियम के तहत हो, जिस से कि उसे अपना धर्म न बदलना पड़े, पर जावेद ने उसे मना लिया। उस दिन जावेद ने कहा था।

– मुझे तुम्हारे साथ न लिविंग इन में रहने से प्रॉब्लम है, न हिन्दू बन कर रहने में और ना ही विशेष विवाह अधिनियम के तहत कानूनन शादी करने में। पर मुस्लिम लॉ के मुताबिक हमारा निकाह इस तरह मान्य नहीं होगा।

– तुम्हारे लिए मुस्लिम लॉ कब से इम्पोर्टेन्ट होने लगा

– कभी से नहीं, पर तान्या मैं अपने अम्मी अब्बू को कैसे छोड़ दूँ।

– मैं भी तो अपने माँ-पापा को छोड़ रही हूँ न। और हम कहाँ उन्हें छोड़ रहे हैं, छोड़ तो असल में वो हमें रहे हैं।

– हाँ, सच कहती हो तुम। पर इस तरह उनसे दोबारा किसी भी तरह का रिश्ता रखना नामुमकिन हो जाएगा। लड़की को तो शादी के बाद अपना घर भूलना ही होता है, पर अगर हम मेरे अम्मी अब्बू को भी भुला देंगे को परिवार के नाम पर हमारे पास क्या रह जायेगा?

उस समय तान्या पूछना चाहती थी क्या स्त्री के लिए घर से दूर जाना और घर छोड़ देना दो अलग बातें नहीं होती। क्या जावेद की आधुनिक सोच बस लेक्चर, स्पीच और फेसबुक ट्विटर तक की ही है? पर वह कुछ न कह सकी, जावेद के चहरे पर छाई मायूसी को देख कर वह चुप रह गयी। और उसने मन ही मन सोचा ये बदली हुई या दबी हुई सोच नहीं बस प्यार है जिसके लिए वो अपने आप से थोड़े समझौते कर रहा है ताकि उसे उसके माँ पापा का प्यार मिलता रहे, तो क्या मैं अपने प्यार के लिए ज़रा सा समझौता नहीं कर सकती।

इतने में जावेद फिर बोल पड़ा।

-तुम्हें बस कागज़ पर ही धर्मांतरण करना है। तुम जैसी हो जो हो वही रहने वाली हो। और कौनसा हम अम्मी-अब्बू के पास जा कर रहने वाले हैं। मुझे तुम्हारे अम्मी-अब्बू से थोड़े ही कोई परेशानी है पर उन्होंने तो तुम्हें साल भर पहले ही अलग कर दिया। फिर भी मैं उनके पास जा कर बात करना चाहता था पर तुमने ही मना कर दिया था।

एक और सवाल पल भर के लिए तान्या के मन में कौंधा कि जब मैंने जावेद के आत्मसम्मान के लिए उसका झुकना नामंजूर कर दिया था तो वो ऐसा क्यों नहीं कर सकता। पर उसने उस विचार को आधे में ही झटक दिया। कहीं न कहीं माँ-पापा की कमी उसे खलती थी और वो चाहने लगी थी कि जावेद के माँ-पापा के रूप में ही सही उसे माँ-पापा मिल जाएं।

यह पहला समझौता था जो तान्या ने अपने विचारों और उसूलों के ख़िलाफ़ जा कर किया था। उसने तान्या से तसनीम बना स्वीकार कर लिया।

व्यक्ति बस एक बार अपना सबसे महत्वपूर्ण अस्त्र किसी अपने के हाथ में थमाता है और फिर वही अपना उस व्यक्ति पर उसके ही अस्त्र से निरंतर वार करता रहता है। किसी ने सही कहा है, हमारा अस्त्र हमारा अप्रत्यक्ष हाथ होता है। अपना हाथ काट कर किसी को भी नहीं सौंपा जा सकता, अगर ऐसा किया गया तो वह हाथ न अपनी मदद कर सकता है न दूसरे की।  तान्या उर्फ़ तसनीम ने भी यही गलती कर दी थी और ख़ामियाज़ा उसे चार साल तक भुगतना पड़ा।

शादी के कुछ ही दिनों बाद जावेद में माता-पिता ने जावेद को स्वीकार कर लिया पर शर्त यह थी कि तसनीम उनके धर्म को पूर्ण रूप से अपनाएगी। और इसके लिए उसकी दो ननद उसके साथ रहने के लिए आ गईं। जिनका कार्य था तसनीम को सारे रीति रिवाज़, समाज में उठने बैठने का व्यवहार सिखाना साथ ही साथ यह ध्यान रखना कि कहीं वह फिर से अपने पिछले जीवन को न अपना ले।

उन दोनों के घर में प्रवेश करने के बाद जो सबसे पहला कार्य हुआ वह यह था कि तान्या के बाल गणेश की नन्हीं प्रतिमा को उसके संदूक में विराजित होना पड़ा। जावेद का बड़ा सीधा सा लॉजिक था, थोड़े दिन के लिए आई हैं बहने, थोड़ एडजस्ट कर लो। थोड़ा थोड़ा कब बहुत ज़्यादा हो गया पता ही नहीं चला। छह महीनों के अंदर ही तान्या कहीं मर गयी और उसकी जगह ले ली एक नई तसनीम ने।

इन छह महीनों में तान्या ने न सिर्फ़ अपना नाम और पहचान ख़ोयी बल्कि अपना काम, अपने दोस्त, अपने सपने और वह सब कुछ खो दिया जो उसे तान्या नाम से जोड़ता था। अब उसके जीवन में बस एक ही व्यक्ति था “जावेद”।

छह महीने तक तान्या के सास-ससुर और बाकी के परिवार वालों ने उसका मुँह तक नहीं देखा था। छह महीने बाद उसे ससुराल बुलाया गया और उसके साथ ही शुरू हुई तान्या की नई अग्निपरीक्षा। अब उस पर लगातार माँ बनने के लिए दबाव बनाया जाने लगा। मन के किसी कोने में अब भी वह अपने सपनों को पूर्ण करने की राह खोज़ रही थी पर सपने उसी दिन ख़त्म हो गयी जब जावेद उसे अकेला घर में छोड़ कर शहर लौट आया।

ससुराल में रहते हुए उसे बहुत कुछ पता लगा। जावेद के चाचा की लड़की के साथ जावेद का विवाह होना था जो कि तान्या के चक्कर में न हो सका। अब जब सारा खानदान एक साथ था तो उसको न जाने कितने ताने कितने इल्ज़ामों से गुजरना पड़ता। साथ ही साथ कुछ लोगों की नज़रों के सामने वो बहुत ही असहज भी महसूस करती थी, जबकि घर की बाकी स्त्रियाँ उन लोगों के सामने सहज होती।

अपनी पूरी ज़िंदगी को बदल कर एक नई चुनी हुई राह पर चलने का यह सफ़र जारी रहा। दो साल बीत गए और अब जावेद के माता-पिता सन्तान की चाह में जावेद का निकाह फिर से उसके चाचा की लड़की के साथ करने के लिए दबाव बनाने लगे। तान्या ने और जावेद ने संतान के लिए जी जान से कोशिश भी की पर शायद उनकी किस्मत में बच्चा था ही नहीं। तान्या जब भी शहर लौटती तो रो धो कर हर तरह से जावेद को मनाने की कोशिश करती कि वह उसको वापिस जावेद के घर न भेजे पर कुछ एक महीने के बाद दो तीन महीने के लिए उसे अपने माता-पिता के पास भेज देता। तान्या का सोशल सर्कल पूरी तरह ख़त्म हो चुका था। उसकी हज़ार कोशिशों के बाद भी वह जावेद के परिवार से सामंजस्य नहीं बैठा पाती। जिस जावेद से कभी उसे प्यार था वह जावेद तो जैसे कभी था ही नहीं और जो तान्या वह ख़ुद थी वह उसके ही भीतर कहीं वेंटिलेटर पर पड़ी हुई थी।

कहीं न कहीं अब तान्या ख़ुद भी बच्चा नहीं चाहती थी। वह नहीं चाहती थी उसकी संतान जावेद की तरह किसी के जीवन से खेले या फिर उसकी तरह आत्मदाह के पाप से दबी रहे। पर जावेद और उसके परिवार वाले बच्चे के लिए ज़मीन आसमान भी एक कर देना चाहते थे। कुछ तीन साल हुए होंगे उनकी शादी को जब जावेद अचानक से उसे लेकर वापिस शहर आ गया और उसको कहा

– अब से तुम उस घर में कभी नहीं जाओगी

तान्या को जैसे बिन मांगे मोती मिल गया था। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ तो पूछ पड़ी

– क्या हुआ

– कुछ नहीं, बस मैं अब और तुम से दूर नहीं रह सकता और ना ही तुम्हें इस तरह उदास देख सकता हूँ।

– तुम मज़ाक कर रहे हो या मैं सपना देख रही हूँ।

उसकी बात सुन कर जावेद हंस पड़ा। कितने समय बाद उसने आज जावेद की आँखों में वही चमक देखी थी जिस पर कभी उसका दिल आ गया था। कुछ दिन अच्छे से बीते। फिर एक दिन जावेद ने कहा किसी काम से उसके पिता ने उसे बुलाया है और वह हफ़्ते भर में आ जाएगा। इस हफ्ते में पहली बार इतने सालों में तान्या के माता-पिता से बात करने की उसने हिम्मत दिखाई। उसके माता पिता उसे माफ़ तो नहीं कर पाए धर्म परिवर्तन के लिए पर उन्हें इतने सालों बाद बेटी की आवाज़ सुन कर अच्छा लगा। और उसे उसके पति के साथ घर आने का भी उन्होंने न्योता दे दिया।

तान्या सोच रही थी कितना अंतर है मेरे माता पिता और जावेद के परिवार में। किस चीज़ का अंतर है यह, समाज का, धर्म का, सन्तान प्रेम का या फिर किस्मत का।ख़ैर उसे उसका प्यार इतनी पीड़ा, इतने दर्द के बाद वापस मिल रहा था तो उसने कुछ भी ऐसा सोचना सही नहीं समझा जो फिर से उनके बीच में आ जाए। हालांकि बहुत सोचने पर भी उसे याद नहीं आया उसने क्या और कब कुछ गलत किया या कहा था जो जावेद उससे इतना दूर हो गया। वो तो आँख बंद करके जो जो वह कहता गया… करती गयी, फिर वह कहां गलत हो गयी थी। उसे इस सवाल का जवाब नहीं मिला तो उसने इस सवाल को भी सभी सवालों की तरह छोड़ दिया।

घर से लौटने के बाद अब जावेद हर वीकेंड पर घर जाने लगा था। तान्या ने उसको अपने माता पिता से मिलने को कहा तो पहली बार जावेद ने उस पर हाथ उठाया, गाली गलौच की यह कहते हुए कि “तुम काफ़िर बस शिकायत करना जानते हो, काम करना नहीं”

ये शब्द तान्या के मन मस्तिष्क में हर समय गूंजते ही रहते थे। साल भर और बीता और एक दिन तान्या को पता लगा की जब जावेद उसे हमेशा के लिए शहर ले आया था तभी जावेद ने अपने चाचा की लड़की से निकाह कर लिया था और अब वह पिता भी बन गया है। उसके दो जुड़वा बच्चे हैं। उस दिन तान्या फुट फुट कर रोई पर उसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं था। जावेद अब भी अपने घर गया हुआ था। तान्या ने जब जावेद को फोन किया तो उसका फोन उसकी नई पत्नी ने ही उठाया और तान्या को सब कुछ बता कर उसने तान्या से अपना बदला ले ही लिया था।

उस दिन तान्या विषाद और रोष से भर गई थी और उसने एक लंबा चौड़ा मैसेज लिख कर जावेद को भेज दिया। मैसेज में उसने अपने बीते हुए दिनों की दुहाई से लेकर अपने प्यार का वास्ता तक दिया था। उसके साथ होने वाले हर जुल्म पर सवाल किया, जवाब मांगा और कोर्ट जाने की धमकी भी दी।

जवाब में उसे बस तीन शब्द मिले

तलाक़… तलाक़… तलाक़

एक तीन शब्द के मैसेज ने तान्या को सड़क पर ला कर खड़ा कर दिया। रात बीती ही थी कि जावेद की बहन और चाचा ने आकर तान्या का संदूक सड़क पर पटक दिया। इस समय तान्या को बस निधि का नाम ही याद आया। निधि जिसने जावेद और तान्या के रिश्ते के प्रति अपनी नाराजगी हर एक मोड़ पर जताई थी उससे भी जावेद के बहकावे में आकर तान्या किनारा कर चुकी थी, झगड़ चुकी थी, और कभी भी बात न करने की बात तक कह चुकी थी।  निधि भी भले ही तान्या से नाराज़ रही हो, उनके बीच बोलचाल बन्द हो गयी हो पर वो दोनों बेस्ट फ्रेंड्स थी। और तान्या के जन्मदिन पर इन चार सालों में भी सबसे पहले उसका ही मैसेज आता था।

सिसकती हुई तान्या ने चार साल बस निधि को फोन किया और उसने पहली ही बेल्ल में फोन उठा भी लिया

– हेल्लो

तान्या के मुँह से शब्दों के स्थान पर सिसकियाँ ही निकलती रहीं।

निधि ने ही जरूरत को समझा और पूछा

– तानी(तान्या) क्या हुआ? रो क्यों रही है? कहाँ है तू

बहुत देर तक तान्या फोन पर ही सिसकती रही और फिर हिम्मत करके बोली

– जावेद ने मुझे तलाक़ दे दिया है।

कहना तो तान्या निधि को सॉरी भी चाहती थी, पर उसके मुँह से कुछ और निकला ही नहीं।

निधि ने पूछा

– कहाँ है तू अभी

– सड़क पर

इसके आगे न निधि को पूछने की जरूरत पड़ी न तान्या को कहने की।

हज़ार चक्कर लगाए थे निधि ने तान्या से मिलने के लिए उस कॉलोनी के पर जावेद ने कभी उसको तान्या से मिलने नहीं दिया। एक बार जब वह तान्या तक पहुंच भी चुकी थी तो तान्या ने उसको देखते ही उसके मुँह पर दरवाज़ा बन्द कर दिया था। प्यार कितना अंधा हो सकता है निधि जान चुकी थी, इसलिए उसने फिर कभी उन दोनों को परेशान करने की कोशिश नहीं की। हर साल तान्या के जन्मदिन पर मैसेज करके वो बस यह सुनिश्चित करती थी कि तान्या के पास अब भी फोन है, वह अब भी ठीक होगी। कहीं न कहीं वह जानती थी मुश्किल में तान्या के पास कोई नहीं होगा, ऐसे में उसकी यह छोटी सी कोशिश तान्या के पास मदद का एक दरवाज़ा हमेशा खुला रखेगी। और उसका ड़र सही साबित हो ही गया। तान्या को आज मदद की जरूरत थी, और तान्या ने ये मात्र दरवाज़ा खटखटा ही दिया।

अंतरजातीय अथवा अंतर्धार्मिक विवाहों में लड़की हमेशा अकेली ही रह जाती है। अपने परिवार को प्रेम के नाम पर वह स्वयं छोड़ देती है और जिस परिवार को अपनाने जाती है वह उसे अपना ले यह बस सौ में से दस लोगों के साथ होता है। और इन दस में से भी आठ विवाह ऐसे होते हैं जिनमें लड़का लड़की और अपने परिवार के बीच सामंजस्य बैठाने की अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लेता है। सब कुछ लडक़ी के एक तरफे समर्पण और  सहनशीलता पर निर्भर हो जाता है। बहुत कम ऐसा होता है जहां लड़का, लड़की और परिवार तीनो पक्ष उस पारिवारिक डोर को उलझने और टूटने से बचाने का प्रयास करते हैं।

निधि के सामने अब सारी स्थिति स्पष्ट थी। वह चाहती थी कि तान्या एक कानूनी लड़ाई लड़े पर तान्या इन चार सालों में अपना आत्मविश्वास पूर्ण रूप से खो चुकी थी, उसे बस रोने के लिए थोड़ा समय चाहिए था और गले लगने के लिए एक दोस्त। प्रेम, जीवन, भाग्य हर चीज़ पर से उसने विश्वास खो दिया था। निधि को समझ आया कि इस समय तान्या को सलाह नहीं सहारा चाहिए और उसने इस बारे में बात न करने का निर्णय लिया।

एक हफ़्ता बीत गया। दिन में पाँच दफ़े अपनी आदत के मुताबिक तान्या चटाई बिछा कर बैठ जाती पर कुछ कर नहीं पाती। निधि रोज़ सुबह शाम दीया करती देवी माँ की फ़ोटो के आगे पर चाह कर भी जब वह दीपक जला रही होती तो तान्या के पैर उस टेबल तक नहीं जा पाते जहाँ तान्या ने अपनी माता रानी रखी थी। उसे लगता जैसे वो कितनी मैली हो गयी है, पूजा में प्रवेश करेगी तो कहीं माँ की चुनरी भी मैली न हो जाये। निधि के बुलाने पर भी तान्या कभी जलते दीपक वाले कमरे में न जा पाती। कुछ दिन बीते ही थे कि निधि ने उससे पूछा

– जॉब करेगी?


– कैसी जॉब


– वो मैं ढूंढ लूँगी, तू बस ये बता कि घर से बाहर जाना चाहती है या ज़िन्दगी भर उसके लिए रोना ही है तुझे


– मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा


– कोई बात नहीं, तू अपने डाक्यूमेंट्स निकाल तेरा रिज्यूम बनाते हैं शाम को


– हम्म

आज जब निधि के जाने के बाद तान्या ने अपना संदूक खोला तो उसमें एक लाल कपड़े में लिपटे उसके बाल गणेश उसे देख कर उसी तरह मुस्कुरा रहे थे जिस तरह उसके हर नए कार्य की शुरआत में मुस्कुराते थे। तान्या उन्हें सीने से लगा कर रोती रही। आज वह पांच वक़्त की नमाज़ के लिए नहीं बैठी। पर शाम की अज़ान की आवाज़ के साथ साथ जब उस घर की बेल भी बजी तो जाने क्यों उसका दिल धक से हो गया। निधि लेट घर आती है, और कोई इस घर में आते हुए उसने देखा नहीं। जाने क्यों  उसको लगा शायद जावेद उसको लौटा ले जाने के लिए आया हो। पर उसने उस विचार को दरकिनार कर दिया।

दरवाज़ा खोला तो सच में जावेद सामने खड़ा था। और वह तान्या को वापिस ले जाने के लिए ही आया था। तान्या उसे एकटक बस देखती ही रही। और जावेद ने उससे लिपट कर कहना शुरू किया।

– मैंने तुम्हें बहुत मिस किया तान्या। वह मैसेज मैंने चाचा-चाची के कहने पर किया था। शादी भी अम्मी-अब्बू की वजह से की थी। प्यार मैं तुमसे ही करता हूँ पर तु माँ नहीं बन सकती थी। क्या करता

– अब क्या करना चाहते हो(मुट्ठी में बाल गणेश की प्रतिमा को भींचे हुए ही तान्या ने कहा

– तुम्हें वापस ले जाने आया हूँ

– पर हमारा तलाक़ तो व्हाट्सएप्प पर हो गया न

– हम दोबारा निक़ाह कर लेंगे तसनीम, बस तुम्हें एक बार हलाला से गुजरना है। फिर सब ठीक हो जाएगा

यह बात सुनते ही तान्या को लगा जैसे किसी ने उसके ऊपर नंगा बिजली का तार फेंक दिया हो। जावेद को लगभग धक्का देते हुए वह बोली।

– मुझे बिस्तर पर बिछी हुई चादर समझा है क्या कि आज तुम्हारे बिस्तर पर बिछी, कल तुम्हारे किसी भाई या चाचा के बिस्तर पर और फिर धुल कर दोबारा तुम्हारे बिस्तर पर बिछा दी जाऊँ और मेरा नाम तान्या है

तान्या की आधी बात को नज़रंदाज़ करते हुए जावेद फिर बोला

– हाँ, हाँ तान्या। क्या फ़र्क़ पड़ता है नाम से। मैं तो तुमसे ही प्यार करता हूँ फिर तुम तान्या हो या तसनीम

– फ़र्क़ पड़ता है और अगर फ़र्क़ नहीं पड़ता तो तुम इस बार जावेद से जयदीप बन जाओ

– ये क्या कह रही हो? अच्छा छोड़ो तुम्हारे लिए मैं जयदीप ही सही… ख़ुश

– मेरे लिए नहीं,समाज के लिए और ये लो (अपने बाल गणेश को जावेद के हाथों में रखते हुए तान्या ने कहा) आज से पांच वक़्त की नमाज़ की जगह गणपति स्त्रोत का पाठ करोगे?

गणपति को अपने हाथ में आते ही जावेद ने उनकी प्रतिमा को पटक दिया और उसके साथ ही तान्या ने जावेद को एक जोरदार थप्पड़ रसीद किया।

तान्या बोली

– मैंने तुम्हारा साथ माँगा था, सहारा नहीं। तुम से हिसाब किताब पूरा करना है मुझे जावेद। मेरा हिसाब अभी बराबर नहीं हुआ।

यह कहते हुए तान्या ने जावेद को धक्का दिया और दरवाज़ा उसके मुँह पर बन्द कर दिया। अपने नन्हे गणपति को उठा कर माता रानी के बगल में रखा।

रात में निधि जब लौट कर आई तो दीपक पहले से प्रज्वलित था और तान्या के गणपति महाराज भी विराजमान थे। उसने तान्या की तरह अचरज से देखा तो तान्या बोली

– कल गणेश चतुर्थी है। लैपटॉप खोल मुझे मोदक बनाने सीखने हैं। इस बार मैं अपने गणु महाराज के लिए ख़ुद मोदक बनाऊंगी।

निधि ने सोचा प्रेम अपनी कीमत ख़ुद वसूल लेता है और भाग्य अपना रास्ता ख़ुद बना लेता है। निर्वासन ही कभी कभी स्वतंत्रता का परचम लहराता है।

अस्तित्वहीन

Everything which seems alive is dead inside

वो अपनी जगह सही होते हैं

वो लोग जिन्हें हम गलत कहते हैं

जो छोड़ कर चले जाते हैं मझधार में

जिनके दिल नहीं पिघलते आँसुओं से भी

जो हंसते हुए मिलते हैं

उसी राह पर किसी और के संग

जिस राह पर कभी हाथ हमारा थामा था

वो लोग अपनी जगह बिल्कुल सही होते हैं

जो खोज़ लेते हैं अपनी ख़ुशी अपने ही भीतर

जिनके भीतर के खारे दरिया को

मीठी नदियों को प्यास तो होती है मगर

जो एक नदी के सूखने से मरते नहीं

जो हज़ारों नदियों के पानी से भी होते नहीं मीठे

वो लोग सही होते हैं

वो अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए

लड़ते है, हड़पते हैं पर बचा तो लेते हैं ख़ुद को

समर्पण में डूबे लोगों सा भी क्या होना

जो प्यार में खो देते हैं अपनी खुशियों का मीठापन

सूख जाते हैं दरिया की तलाश में

या फिर समंदर में जा कर हो जाते हैं

अस्तित्वहीन।